भारत की वैज्ञानिक परंपरा और महर्षि वराहमिहिर | A Spiritual-Scientific Insight by Swami Jyoti Giri
महामंडलेश्वर स्वामी ज्योति गिरी महाराज (जूना अखाड़ा) जिनके हरियाणा, गुजरात,
महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश आदि में स्थित आश्रम आज education और health services
के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हैं।
उनके पढ़ाए हुए छात्र UPSC,HCS,RAS,MPSC जैसे कॉम्पिटेटिव एग्जाम की तैयारी करके देश की प्रगति में सहायक है
शिक्षा, सेवा और आध्यात्मिक उन्नति— यही स्वामी ज्योति गिरी महाराज के जीवन
का उद्देश्य है। आज के इस लेख में स्वामी जी ने वराहमिहिर के माध्यम से भारत के
ज्ञान विज्ञान पर प्रकाश डाला है पढ़िए ये ज्ञानवर्धक लेख
महान German scholar
Max muller ने कहा था की " "यदि मुझसे पूछा जाए कि किस आकाश के नीचे मानव मन ने
अपनी श्रेष्ठतम प्रतिभाएँ सबसे अधिक विकसित की है, तो मैं भारत की ओर संकेत
करूंगा।" और ऐसी अनेकों प्रतिभाओं और क्षमताओं में से एक है भारत की ज्योतिष,
गणित एवं खगोल शास्त्र परम्परा । यू तो भारत भू ने अनेकों प्रतिष्ठित एवं महान
ज्योतिष, खगोल शास्त्री एवं गणितज्ञ इस संसार को दिए है। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त
से लेके नौवी शताब्दी में जन्मे महावीर तक, भारतीय गणितज्ञ और ज्योतिषों की बड़ी
सूची है। लेकिन जिस स्थान पर हम है, सप्त मोक्षपुरियों में से एक, महाकाल की
धरती, अवंतिका नगरी उज्जैन, इस धरती पर छठी शताब्दी में जन्मे ज्योतिष एवं
गणितज्ञ वराहमिहिर का स्थान अद्वितीय है। जो काम उन्होंने गणित, ज्योतिष और खगोल
के क्षेत्र में किये और जो सिद्धांत उन्होंने दिए, वे आज भी प्रासंगिक है और
ब्रह्मांड के रहस्यों को हल करने में मदत करते है। वराहमिहिर का जन्म 505 ईश्वी
में, उज्जैन के निकट कपिथका नामक ग्राम में हुआ, उनकी ज्योतिश गणना, गणित और खगोल
शास्त्र में शुरू से ही रुचि थी। यहाँ तक की उनका नाम मिहिर से वराहमिहिर होने की
भी दो रोचक कथायें है, एक के अनुसार बचपन में वह वराह जानवर के हमले से बच गए थे
जो कि लगभग नामुमकिन सा था, तत्पश्चात उनका नाम वराहमिहिर पड़ा, और दूसरी जो उनके
नाम के पीछे की कथा है, वह उनके ज्योतिष कौशल को दर्शाती है, तत्कालीन सम्राट
अवंती नरेश विक्रमदित्य के पुत्र के बारे में वराहमिहिर ने अपनी प्रतिभा और गणना
के अनुसार भविष्यवाणी की, उस लड़के के 18 वे साल में उसकी मृत्यु वराह जानवर से
होगी, 18 साल पहले की गई इस भविष्यवाणी को झूठा साबित करने हेतु और अपने पुत्र के
प्राण बचाने हेतु सम्राट और सम्रागी ने भरपूर प्रयास करे, अपितु अठारवे साल के
जिस महीने एवं जिस दिन उस लड़के की मृत्यु की भविष्यवाणी वराहमिहिर ने की थी, उसी
समय अनुसार उसकी मृत्यु राज्य के भारी भरकम चिह्न के गिरने से हुई और उस चिह्न
में वराह की आकृति थी। वराहमिहिर की भविष्यवाणी से बचने के लिए सम्राट ने अपने
पुत्र को कक्ष में बंद करदिया, लेकिन फिर भी उसका काल, वराहमिहिर की गणना के
अनुसार आया और वराह के रूप में ही आया, तत्पश्चात मिहिर से वह वराहमीहीर के नाम
से जाना जाने लगा । वराहमिहिर ने वेद, उपनिषद, गणित, खगोल, ज्योतिष, मौसम
विज्ञान, भूगोल और प्राकृतिक विज्ञान जैसे विषयों का गहन अध्ययन किया। वे केवल
ज्योतिषी ही नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सोच रखने वाले शोधकर्ता थे। उनकी सबसे
महत्वपूर्ण किताब बृहत्संहिता है जो की एक विश्व-प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसमें मौसम
पूर्वानुमान, भूकंप के संकेत, ग्रहों-नक्षत्रों का प्रभाव, वास्तुशास्त्र, रत्न
विज्ञान, कृषि भविष्यवाणी, नदियों, बादलों और ऋतुओं का वर्णन किया है। महान
गणितज्ञ वराहमिहिर ने गणित के क्षेत्र में भी अद्भुत योगदान दिए जैसे जत्रो-गणित
(trigonometry) का विकास, आर्यभट्ट द्वारा निर्मित साइन तालिकाओं का विकास एवं
उनका इस्तेमाल करके ग्रहों की दूरी, गति और स्थिति की गणना करना और सूर्य और
चंद्र ग्रहण के नियम का वर्णन भी वराहमिहिर ने किया। उन्होंने कई तत्कालीन
वैश्विक गणितीय सूत्र पहली बार भारत में प्रचारित किए। जिन pascal's triangle और
binominal coefficients के बारे में हम आज पढ़ते हैं, उनका वर्णन वराहमिहिर ने
पंद्रह सौ साल पहले अपने कार्यों में करदिया था। उन्होंने गणनाओं में शून्य और
ऋणात्मक संख्याएँ यानी negative integers कैसे काम करती हैं, यह समझाया और
बीजगणित में धनात्मक (positive) तथा ऋणात्मक (negative) संख्याओं के उपयोग के
नियम स्पष्ट रूप से बताए। एक तरफ़ मध्यकालीन पश्चिमी सभ्यता ये पता करने में
व्यस्त थी कि धरती का आकार क्या है, और उनसे हज़ार साल पहले वराहमिहिर ने ये बता
दिया कि सूरज stationary है और धरती एवं बाक़ी ग्रह उसकी परिक्रमा करते है।
उन्होंने प्रकाश के व्यवहार का अध्ययन किया कि वह सतहों से टकराकर कैसे परावर्तित
यानी reflect होता है तथा पदार्थों के भीतर से गुजरते समय कैसे अपवर्तित यानी
refract होता है। उन्होंने इन प्रक्रियाओं को इस प्रकार वर्णित किया कि कण
वस्तुओं से टकराकर लौट आते हैं या उनमें से होकर आगे निकल जाते है। वराहमिहिर को
मौसम विज्ञान का जनक कहना भी अतिशोक्ति नहीं होगी क्युकी भारत में मौसम विज्ञान
को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय भी वराहमिहिर को दिया जाता है। उन्होंने बताया कि
बादलों का रंग, हवाओ की दिशा, पक्षियों और जानवरों का व्यवहार और पेड़ों की नमी,
इनसब से मौसम की भविष्यवाणी की जा सकती है। वराहमिहीर एक globalist outlook यानी
वैश्विक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति थे, उन्होंने भारत के सिद्धांतों एवं विश्व
के अन्य सिद्धांतों को पढ़ा और उन्हें एक किया, उनके पंचसिद्धांतिका नामक कार्य
में विश्व की पाँच सबसे प्रसिद्ध ज्योतिषीय परंपराओं का वर्णन एवं संश्लेषण है।
वराहमिहिर केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि एक नवोन्मेषक (Innovator) थे। उनकी सोच
वैज्ञानिक थी- तर्क के आधार पर चलने वाली। वे हमेशा कहा करते थेः "ज्ञान वही है,
जो सभी के लिए उपयोगी हो।" knowledge is and shall be a public good, ये सिद्धांत
हमारी भारतीय सभ्यता का बेहद पुराना सिद्धांत है। भारतीय खगोल-परंपरा और हमारी
समूची सभ्यता अत्यन्त महान है, परन्तु दुःख की बात यह है कि आज बहुत-से लोग इससे
अनभिज्ञ हैं। पश्चिमी प्रभाव और मानसिक गुलामी ने हमारे स्वयं के ज्ञान-वैभव को
हमारे ही सम्मुख धूमिल कर दिया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम पुनः अपनी भारतीय
सभ्यता की गहनता में उतरकर देखें। जब हम अपने मूल की ओर लौटेंगे, तब हमें ज्ञान,
विज्ञान, दर्शन, गणित, खगोल और साहित्य- हर क्षेत्र में अनगिनत रत्न, अनमोल
निधियाँ और अद्वितीय आचार्य प्राप्त होंगे। हमारी परंपरा अपार है, बस हमें उसे
पुनः पहचानने और आत्मसात करने की आवश्यकता है।
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