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मिहिर भोज के बाद अब पृथ्वीराज चौहान को भी बताया गुज्जर, कहीं यूपी इलेक्शन के कारण तो नही पैदा किया जा रहा विवाद

राजा सुहेल देव और राजा मिहिर भोज के बाद अब पृथ्वीराज चौहान की जाति को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है


राजा सुहेल देव और राजा मिहिर भोज की जाति को लेकर छिड़ा विवाद अभी किसी नतीजे पर पहुंच भी नहीं पाया है कि अब एक और राजा की जाति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। उनका नाम है- पृथ्वीराज चौहान। गुर्जर समाज ने पृथ्वी राज चौहान के अपनी बिरादरी का होने का दावा किया है। अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा का कहना है कि भविष्य में सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर पृथ्वीराज चौहान की जो भी मूर्तियां स्थापित हों, उनके शिलापट पर गुर्जर सम्राट पृथ्वीराज चौहान लिखा जाए। स्कूली पाठ्यक्रमों में इसके लिए जहां-जहां बदलाव जरूरी हो, वहां बदलाव किया जाए। गुर्जर महासभा की यह भी मांग है कि पृथ्वीराज चौहान पर जो फिल्म आ रही है, उसमें भी उन्हें गुर्जर सम्राट के रूप में ही दर्शाया जाए। गुर्जर महासभा इस मुद्दे पर जन जागरण अभियान भी शुरू करने जा रही है। वहीं राजपूत समाज का दावा पृथ्वीराज चौहान के राजपूत होने को लेकर बना हुआ है।


पृथ्वीराज चौहान की जाति को लेकर विवाद कैसे खड़ा हुआ और उनके गुर्जर होने की बात अचानक कैसे आई? इस सवाल पर गुर्जर महासभा का कहना है, 'इसे विवाद बताना गलत होगा और ऐसा भी नहीं है कि पृथ्वीराज के गुर्जर होने की बात अचानक पता चली है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि पृथ्वीराज चौहान गुर्जर थे। यह अलग बात है कि यह जानकारी उतनी आम नहीं हो पाई, जितनी होनी चाहिए थी। इसलिए हम लोग उस ऐतिहासिक तथ्य को जनता के बीच लाना चाहते हैं।'

गुर्जर महासभा के लिए अभिलेख जुटाने वाले डॉक्टर जितेश गुर्जर के अनुसार, 'अजमेर का जो राजवंश है- प्रतिहार, परमार, सोलंकी और चौहान, उन सबका मूल गुर्जर ही है। ऐसे में पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने पर शक होना ही नहीं चाहिए।' वहीं, महासभा के मार्गदर्शक आचार्य वीरेंद्र विक्रम पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने का प्रमाण इतिहास से देते हैं। उनका कहना है, 'पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि जयानक ने पृथ्वीराज विजय महाकाव्य की रचना की थी। उसमें तमाम जगह पर पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने की बात लिखी हुई है।' आचार्य के मुताबिक- इस महाकाव्य की रचना साल 1191 में हुई थी, जब पृथ्वीराज ने मुहम्मद गोरी को हराया था। इसलिए इसके गलत होने की गुंजाइश न के बराबर है। वह इसे सबसे पुराना और प्रमाणिक दस्तावेज बताते हैं। महासभा का कहना है कि अगर कोई ऐतिहासिक पक्ष गलत तरीके से पेश किया जा रहा हो, तो उसे सही करने की जिम्मेदारी समाज की है और हम लोगी उसी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं।

लेकिन, राजपूत महासभा पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने के दावे को सिरे से खारिज कर रही है। महासभा का कहना है कि अब दो हजार साल के बाद यह याद आना कि पृथ्वीराज चौहान गुर्जर थे, स्थापित तथ्यों और इतिहास को नकारना हुआ।

पृथ्वीराज चौहान की जाति को लेकर छिड़े विवाद की अहमियत इसलिए भी ज्यादा हो जाती है क्योंकि दो राजाओं की जाति को लेकर पहले से ही बहस चल रही है। इनमें से हैं एक राजा सुहेलदेव, जिनपर तीन अलग-अलग जातियों के दावे हैं। ओबीसी में आने वाले राजभर समाज के लोग राजा सुहेलदेव को अपना राजा बताते हैं। अनुसूचित जाति में आने वाले पासी समाज के लोग भी उन्हें अपना राजा बताते हैं और राजपूतों का भी उन पर दावा है। इसी साल फरवरी महीने में जब यूपी में उनके नाम पर स्मारक बनाए जाने की आधारशिला रखी गई, तो तीनों खेमे आमने-सामने थे। राजपूत करणी सेना का कहना था, 'यह हमारे मान, सम्मान और स्वाभिमान से जुड़ा मामला है। राजनीतिक लाभ लेने के लिए उन्हें राजपूत समाज से अलग करने की साज़िश की जा रही है, जिसका हम विरोध करेंगे।'

इसके बाद राजा मिहिर भोज की जाति को लेकर भी विवाद हुआ। राजपूत उन्हें अपना राजा बता रहे हैं और गुर्जर उन्हें अपना। उत्तर प्रदेश में तो उनकी प्रतिमा स्थापित करने के बाद राज्य सरकार धर्मसंकट में पड़ गई है। वह यह नहीं तय कर पा रही है कि मिहिर भोज को गुर्जर राजा कहे या क्षत्रिय। वहां बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर कहा- 'महापुरुषों को कभी जातीय सीमाओं में कैद नहीं करना चाहिए। उनका महान बलिदान किसी व्यक्ति या परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए होता है।' मध्यप्रदेश में जब 8 सितंबर 2021 को राजा मिहिरभोज की एक प्रतिमा का अनावरण हुआ तो देखा गया कि शिलापट पर मिहिर भोज के साथ गुर्जर भी लिखा हुआ है। उसके बाद जाति विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। अदालत ने कहा कि मूर्ति तो खुली रखी जाए, लेकिन विवाद की जड़ बने शिलापट को ढक दिया जाए।

अब सवाल उठता है कि राजाओं पर जातियों का ठप्पा क्यों लग रहा है? दरअसल राजनीति में जाति समूहों का महत्व बढ़ गया है। उन्हें बहुत निर्णायक माना जाने लगा है। इस वजह से अब हर जाति के अपने संगठन तैयार हो गए हैं। ऐसे में हर जाति को अपना 'आईकॉन' चाहिए ही है। 'आईकॉन' से ही ताकत आती है। समाज की गोलबंदी बढ़ती है। इस वजह से 'आईकॉन' को लेकर होड़ है। एक-एक 'आईकॉन' पर कई-कई के दावे हैं। राजाओं पर होड़ इसलिए ज्यादा है कि इससे अतीत मजबूत दिखता है।

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