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विचार:- प्रतिभा व शिक्षा की पहचान मात्र सर्टिफिकेट या काम की सफलता,कोरोना में क्यो अछूते रह गए अनेक प्रतिभाशाली डॉक्टर व अन्य लोग? -धीरज शर्मा

कोरोना महामारी के चलते मेरे इस लेख का विषय है कि हम प्रतिभा को दरकिनार करके सिस्टम द्वारा प्रामाणिक व्यक्तिओ की सहायता से कैसे आगे बढ़ेंगे। इनके साथ ही ये और कहना चाहता हूँ कि कोरोना ने हमे सिखाया है कि बहुत से अच्छे डॉक्टर को समाज व सरकार से उचित सम्मान न मिलने से वो विदेश की राह पकड़ रहे है या इस देश मे रहते हुए अपने पेशे को ईमानदारी से नही निभा रहे है। साथ ही ये भी कहूंगा कि कोरोना में शिक्षित व अनुभवी डॉक्टर का फायदा सरकार ने नही लिया।
शास्त्रों में ब्राह्मण हत्या महापाप है क्योकि वो समाज के लिए अत्यंत उपयोगी है पर क्या आज का समाज व सरकारे मौजूद ब्राह्मण(डॉक्टर इत्यादि) का सम्मान कर रहे है?
कोरोना की लड़ाई में मौजूदा दिशा निर्देशों के चलते सिस्टम ने अच्छे डॉक्टर जिनको मैं जानता हूं जैसे डॉ०नरेंद्र यादव(अनिरुद्ध हॉस्पिटल पटौदी) जिनकी पारदर्शिता का मैं कायल हू तथा डॉ०एस०पी० भनोट(भनोट हॉस्पिटल गुरुग्राम) डॉ०वेदप्रकाश(रेवाड़ी) जो उच्च कोटि का इलाज बहुत सस्ते में कर रहे है साथ ही डॉ०त्रिलोक(त्रिलोक हॉस्पिटल हैलीमंडी) डॉ०जोशी(जोशी हॉस्पिटल पटौदी) व ऐसे ही अन्य डॉक्टरों की शिक्षा व अनुभव को दरकिनार करके उनका कोई फायदा नही लिया। कुल मिला कर ये बोल दिया कि आप मरीजो को देखने के लिए वैध नही हो जबकि सरकार द्वारा अव्यवस्था के कारण और डॉक्टरों की कमी के चलते फ़ोन से भी चिकित्स्क परामर्श देने की कोशिश की गई परंतु साधारण जनमानस उससे वंचित ही रहा। इसी प्रकार देश मे नीम-हकीम,साधु महात्मा जो सालों से लोगो का इलाज करते आ रहे थे उन्हें भी मौका नही दिया गया जबकि वो बेसक कानून की तरफ से वैध न हो पर जटिल बीमारियों का इलाज भी उनके द्वारा किया जाता रहा है।
हमनें कुछ सर्टिफिकेट बांट दिए और बोल दिया कि यही लोग कोरोना संबंधी बात कर सकते हैं और मरीजों का इलाज कर सकते हैं यहां तक की साधारण बीमारियों को देखने के लिए अन्य डॉक्टर व लोगो को डील देने के बजाय सख्ताई कर दी गई जहां सिस्टम को यह जानने की कोशिश जरूर करनी चाहिए थी कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश भारत में लगभग 70% लोग सामान्य बीमारियों के लिए किसी MBBS डॉक्टर के पास जाने के बजाए मेडिकल स्टोर, गांव में मौजूद छोटे-मोटे डॉक्टर या घर के देसी नुक्से का इस्तेमाल अड़ोस-पड़ोस से पूछ कर करता है अगर एकदम से हम भय का माहौल बना कर उन सभी मरीजों को कोरोना से जुड़े अस्पतालों में भेजने की कोशिश करेंगे तो अव्यवस्था फैलना स्वभाविक था।
सरकार को ये सूचना भी रखनी थी कि आज के समय मे कैसे करोड़ो रुपयों में MBBS इत्यादि की डिग्रियां बंट रही है जबकि आए दिन हम कुछ गलत डॉक्टर को देख कर उनके पेशे को गाली देते है पर इस देश ने अच्छे डॉक्टर की न तो मांग की और न समाज या सरकार ने सम्मान दिया है। सरकारी हॉस्पिटल का हाल ये है कि डॉक्टर हॉस्पिटल में मौजूद दवाओं की सूची ले कर मरीजो को देखना शुरू करते है और सभी बीमारी का इलाज उन्हीं दवाओं से करना होता है और अगर प्राइवेट मेडिकल स्टोर की दवाई लिखी तो गैरकानूनी और हॉस्पिटल में दवाई न होने की बात सार्वजनिक की तो सरकार से प्रताड़ना शुरू।

हाल ही में राजस्थान की घटना बता रहा हूं जब एक बोरवेल में बच्चा गिर गया व सरकार से सर्टिफाइड एजेंसियां,इंजीनियर,उपकरण सब फैल हो गए तब गांव के ही एक बिना सर्टिफिकेट बोरवेल का काम करने वाले व्यक्ति को बुलाया गया और घटना स्थल पर पैर रखने के 26 मिनट के अंदर अपने साधारण उपकरण(पाइप,डंडे व रस्सी) से उसने बच्चे को बोरवेल से बहार निकाल दिया। अतः मैं फिर से कहता हूं कि अब समय आ गया है कि हम मौजूदा सिस्टम पर मंथन करें।।
आपकी इस विषय पर क्या राय है जरूर बताएं।

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